बॉलीवुड के दूसरे भरत कुमार की उपाधि मनोज कुमार ने दी धनबाद के धीरज मिश्र को

-युधिष्ठिर महतो(कुमार युडी)

“”देश की कोयला राजधानी धनबाद से उभरे लेखक धीरज मिश्रा””आज लेखक के रूप में धीरज मिश्रा ने खुद को पुरे भारत में साबित किया हैं।लेकिन,उनके लिए झरिया (धनबाद) से लेकर बॉलीवुड (मुम्बई) तक का सफ़र काफी सघर्षशील रहा हैं।उनका जन्म इलाहबाद (उत्तरप्रदेश) में हुआ हैं।पर,बाद में उनके माता पिता किन्ही कारणों से झरिया आये और यहीं बस गए।धीरज की शुरूआती पढाई लिखाई भी यहीं से हुई।उन्होंने बीएससी (गणित) की पढाई आरएसपी कॉलेज झरिया से हुई।बाद में फिर बीएड भी किये।लेकिन,लेखनी के क्षेत्र में जुड़ाव उनका बचपन से ही रहा हैं।स्कूल के समय से ही वे लिखा करते थे।साथ कई अवसरों पर मंच में अपनी बात भी प्रस्तूत किया करते थे।धीरे-धीरे यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा।पर,1993 में जब कलकत्ता बम बिस्फोट हुआ था।उस समय धीरज मिश्रा द्वारा लिखित लेख शांति आवाज अखबार में प्रकाशित हुई।जिसके बाद से उन्होंने मन बना लिया कि वे भी मुम्बई जाएंगे।वहां उनकी बहन रहा करती थी।तो,उन्होंने मुम्बई आना-जाना शुरू कर दिया।फिर उन्हें अपने आप में एक कमी महसूस हुई।उन्हें लगा कि उनका अनुभव फिल्मो में कुछ खास नहीं हैं।इस कारण उन्होंने इप्टा ज्वाइन कर ली और नाटक लिखने लगे।साथ ही कई नाटकों में अभिनय भी किये।उनके द्वारा लिखे कई नाटकों ने प्रसिद्धि दिलाई।जैसे भगतसिंह,हरिश्चंद्र,और भी ढेर सारें।लेकिन,सबसे ज़्यादा प्रसिद्धि उन्हें तब मिली जब उन्होंने इंदिरा गांधी के जीवन आधारित एक नाटक लिखा।जिसका मंचन करीब-करीब 20 से 30 जगहों पर किया गया।उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे।जैसे पतझड़ और बहार।फिर इसका दूसरा भाग खामोशियाँ भी लिखी।जिसे लोगो ने काफी पसंद किया।इसके अलावे उन्होंने कई अखबारों के लिए फ़िल्म समीक्षक के रूप कई वर्षो तक लिखते रहें।एक बार जब वे लाल बहादुर शास्त्री की जीवनी पढ़ रहे थे।तो उन्हें लगा कि इस पर धारावाहिक बनाई जानी चाहिए।उन्होंने पटकथा तैयार कर दी।इस धारावाहिक को बनाने में विचार टीवी नामक एक टीवी चैनल ने मदद की।जब इसका 10-15 एपिसोड ऐसे ही चलता रहा तो,एक दिन धीरज को अनुभव हुआ कि अब इस पर फ़िल्म बनाई जानी चाहिए।वे इसकी कहानी पटकथा को लेकर कई प्रोड्यूसर्स के पास गए।सबने तारीफ की।पर,किसी ने भी प्रोड्यूस करने की बात नहीं कही।जब वे दिल्ली गए हुए थे।तो उन्होंने यह पटकथा जतिन खुराना के पिता को सुनाई।वे इसे प्रोड्यूस करने को तैयार हो गए।फिर जय जवान जय किसान फ़िल्म बनी।

इसके बाद मैं खुदीराम बोस हूँ,चापेकर ब्रोदर्स,ग़ालिब,बिरसा और भी कई सरे प्रोजेक्ट्स पर काम करने की सोचे हैं।जय जवान जय किसान के लिए उन्हें प्रयाग फिलोमत्सव में सम्मानित भी किया गया।जब वे गोआ फिल्मोत्सव में भाग लेने पहुंचे थे।तो,मनोज कुमार ने उन्हें यहाँ तक कह दिया कि धीरज आप दूसरे भारत कुमार शाबित हो सकते हो।धीरज मिश्रा ने झारखण्ड के कलाकारों और यहां की फ़िल्म निति को लेकर भी कहा कि अगर झारखण्ड में फ़िल्म उद्योग का विकास करना हैं।तो,सबसे पहले बाहर से आने वाले फ़िल्म बनाने वालों के लिए दरवाजा सदैव खुला रखना होगा।क्योंकि,यहां के कलाकारों में अभी इतना अनुभव नहीं हैं कि यहाँ के फिल्मो को देश विदेश तक पंहुचा सके।जब फ़िल्म बनाने वाले झारखण्ड आएंगे।तो यहाँ के कलाकारों को भी काम मिलेगा।जैसा धीरज हमेशा से करते हैं।धीरज जिस राज्य में शूटिंग करते हैं।वहां के 40-60% तक के कलाकारों को फ़िल्म में काम देते हैं।जो भी नए कलाकार हैं,उन्हें यह भी संदेश दिया हैं कि आज कई ऐसे मुद्दे हैं।जिन पर काम किया जा सकता हैं।कई ऑनलाइन पोर्टल भी हैं।जहां आप अपनी प्रतिभा को लोगो तक पंहुचा सकते हैं।उनका कहना हैं।पहले आप अपने नाम का डंका इतना बजा दो कि कोई भी आपके काम की प्रशंसा किये बिना न रह सके।पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर भी उन्होंने यह कहा कि देश में पकिस्तान और भारत के अच्छे रिश्ते नहीं हैं।जब तक दोनों देशो के बीच आपसी रिश्ते ठीक नहीं हो जाते।तब तक कोई भी पाकिस्तानी कलाकारों और खिलाडियों को भारत में काम करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।क्योंकि,सभी के लिए सबसे पहले देश हैं।देश को लेकर कोई भी राजनीती नहीं होनी चाहिए।देश और देश के जवानो के हित में काम करना चाहिए।

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